Monday, March 23, 2015

WHY WE CELEBRATE HOLI (हम होली क्यों मनाते है)

जब कभी भी मुझे धार्मिक समारोह, रीती रिवाजो को देखने का समय मिलता है तो मेरे मन में कुछ सहज सरल सवाल आते है (शायद आपके लिए सहज न हो.), इस रिवाज़ की कैसे सुरुआत हुई होगी ? क्यों हुई होगी ? क्या वज़ह है की आज तक ये चल रहे है ? क्या-क्या परिवर्तन इनमे आये है ? इत्यादि.

अभी नव संवत 2072 और हिंदी का पहला महिना चैत्र आधा बीत गया है. ऐसा क्यूँ है की नया साल आधे महिना बाद शुरु हुआ. साफ़ तौर पर देख सकते है, संवत बाद में आया. एक और बात जिस दिन विक्रमी संवत सुरु होता है, उसी समय ईरानियो का नव वर्ष ‘नौरूज़’ सुरु होता है.

तो हिंदी महीने पहले से स्थापित थे, और कोई भी राजा इतने सारे पंडितो, मुनियों और ब्राह्मणों के होते हुए, महीने के आधे में कैसे नया साल सुरु कर सकता है. दूसरी बात ईरानियो का प्रभाव भारत के नाम तक (हिंदुस्तान) पर है, तो इतिहास का कुछ अनुमान तो हम कर ही सकते है. (इरानी सिन्धु नदी को हिन्दू बुलाते थे.)

कोई नहीं, बाल की खाल नहीं निकालते.

बात होली की है. यह हिंदी के आखिरी महिने फाल्गुन का आखिरी दिन अर्थात वर्षांत है. और धुलंडी साल की शुरुआत.

हमारे ब्राह्मणों ने नरसिंह अवतार गढ़ लिया, प्रहलाद गढ लिया, होलिका को माता बना दिया, जो अपने भतीजे को जलना चाहती थी. इस पर मैं टिपण्णी नहीं करना चाहता.

तो फिर होलिका दहन क्यों आया, क्यों अगले दिन रंग लगाते है.

इस पर बहुत कम लोगो ने लिखा है. मैं उस समय की बात सोचता हूँ, जब हिंदी महीनो की पूर्ण रूप से स्थापना हुई होगी.

लोगो ने आपस में सवाल किया होगा, (भारत प्रगति पर था, तो हो सकता हो लोकतंत्र या गणतंत्र रहा हो या कुछ विषयो में जनता या बुद्धिजीवियों की राय ली जाती हो) कि हम साल के आखिरी दिन और साल की शुरुआत को कैसे मनाये.

जैसे दिसम्बर 31, और 1 जनवरी का आजकल चलन है. (पश्चिम की देन)

मेरे अनुसार लोगो ने सोचा होगा, कि हम साल के आखिरी दिन एक साथ खाना बनायेंगे, और मिल-बाँट कर खायेंगे, उस समय कबीलो की बस्ती से गाँव, और गाँव से शहर बने थे. साल के दिनों में क्या-क्या महत्वपूर्ण काम हुए, परिवारों को क्या-क्या उपलब्धियां मिली, कहा-कहा कमज़ोर रहे, इनकी चर्चा के साथ साथ हमारे आपस में एक दूसरे से कितने मनमुटाव हुए, क्यों मनो में दरार आई, इसकी चर्चा को प्रमुख रखा. जैसे आज भी कहते है, बुरा न मानो होली है. (होली, ना की धुलंडी)

एक साथ खाना बनाना, या बड़ी चीज़ को पकाना, फिर अलग-२ पकवान आदि के लये आग की तो जरुरत होती ही है. हो सकता है कि खाना पकाने के बाद रात को आग बड़ी बना कर चर्चाये की जाती हो.

साथ-साथ कुछ खेलो की शुरुआत की होगी. जो फिर एक कबीलाई सोच दर्शाती है. गाँव में वो खेल आज भी खेले जाते है. मैंने भी खेले है, अपने घरो के आस पास, पूर्णिमा की चांदनी रात में, 5-6 घरो को मिला कर रात में लुकम छिपाई (hide and seek) खेलना, बहुत मज़ा आता है. ढोलक बजाना, नृत्य, और खाने के बाद परिवार के साथ बैठ कर चर्चाये सुनना.

तो लोग आपसी तनावों को दूर करते थे, वो भी बातचीत और खेलो के जरिये, ये सुझाव मान कर लागू कर दिया होगा.

फिर सवाल आया नए वर्ष की शुरुआत कैसे हो. इस पर चर्चा में एक तो गले मिलने, सभी को बधाई देने से सुरुआत की होगी. क्योकि पिछली रात को लगभग सभी आपसी मसलों पर नाराजगी दूर हो गयी होगी, अतः गले मिलने, मिठाई बांटने, और नाच-गाना, खाना-पीना आदि की शुरुआत की होगी.

रंग लगाने की शुरुआत बाद में आई होगी, और वो भी शायद नाचगान में शराब में सराबोर होने के बाद. भारतीये कबीले और समाज शराब तो पीते थे. (बुद्ध के समय बहुत व्यापक थी शराब पीना.)

इसमें ना तो प्रहलाद है, ना होलिका है, ना नरसिंह अवतार है. बस एक साल की अंत और शुरुआत है |

आज होली त्यौहार है, विधिवत पूजन से होलिका को प्रज्वलित किया जाता है, चाहे मुहूर्त सुबह 4 बजे का क्यों न हो. ( एक बार मेरे गाँव में सुबह 4 बजे होलिका जली थी.)

ना कोई चर्चा करता, ना सवाल पूछे जाते, नमस्कार या राम-राम जरूर होती है. बस ये त्यौहार किसी तरह शांति से गुजर जाए, बहुतो की यही कोशिश होती है. किसी तरह पोत पूरा हो जाये. अगले दिन लोग गुलाल के बहाने बदला निकलते है, कुछ घरो में छिप जाते है, कुछ खुले आम बदमासिया करते है.

क्यों पोत पूरा करे, क्यों ? क्योकि यह एक त्यौहार है और इसे अगर हम नहीं मनाएंगे तो हम हिन्दू नहीं रह जायेंगे, या हम पर इसे अगली पीढ़ी को देने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी समझ बैठे है !

कोई भी त्यौहार में क्या क्या क्रियाये होंगी, ये कही नहीं लिखा मिलता. बस ये मिलता है की फला-फला लोगो ने इस त्यौहार को इस तरह मनाया था. जैसे कोई यज्ञ हो रहा हो. क्योकि यज्ञो के बारे में साफ़ मिलता है की किस तरह कोनसा यज्ञ किया जाये.

आज हर त्यौहार एक यज्ञ है, आहुति होती है, जजमान आहुति देता है. खुद की बुद्धि की, खुद के समय की, तथ्यों की, इतिहास की. आखिर में बस पोत निभाना बच जाता है, और यही परंपरा वो अगली पीढ़ी को दे जाता है.

एक पढ़े लिखे का काम डिग्री की तस्वीर कमरे में लगाना नहीं है. बल्कि वो कोई भी काम करे, वो उसी तरह क्यों कर रहा है, और वो ये काम कर ही क्यों रहा है, ये जानना बहुत जरुरी है.

और कुछ समझ ना आये तो पहले PK मूवी देख लो.

सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे संतु निरामया |


No comments: