Sunday, March 22, 2015

Man ki Baat (मन की बात)

मन क्या है, कहाँ रहता है, कैसे सोचता है, कैसे फैसले लेता है, कैसे निर्देश देता है, क्या अनुभव करता है, क्या रिकॉर्ड करता है !! ये थोड़े उलझन भरे सवाल लगभग सभी मनुष्यों में आते है !

मेरे अनुसार, सबसे छोटी इकाई इच्छा है. जो जन्म लेती है, फलती-फूलती है, बलवती होती है, कमजोर होती है और अंत में ख़तम हो जाती है. जैसे की मानव जीवन है. जिस प्रकार सभी मानवों की उम्र अलग अलग होती है, कोई जन्म लेते ही गुजर जाता है, कोई 80-90 साल के बाद. और इन सबकी वजहे होती है कि क्यूँ हर कोई मानव/इच्छा अलग-२ उम्र पाता/पाती है. उसी तरह इच्छाओ की उम्र होती है.

तो मन को हम इन सभी इच्छाओ का घर कह सकते है. जैसे विभिन्न मनुष्य एक घर में रहते है.
ये इच्छाए मष्तिस्क के अलग अलग भाग में जन्म लेती है बढती है, तो पूरा मष्तिस्क मन, और भी सरल रूप में एक देश मान सकते है, जहा एक-जैसे नियम क़ानून हो, क्योकि एक समय मस्तिष्क नियमो की समरूपता की हिसाब से काम करता है. जैसे एक देश के नियम क़ानून समय के साथ बदलते रहते है वही स्थिति मष्तिस्क की होती है. लेकिन एक समय पर एक क़ानून होता है. अतः मन की तुलना एक देश से सही प्रतीत होती है.

इसी क्रम में अलग अलग मनुष्यों के अलग अलग मन का होना, विभिन्न देशो के एक धरती पे होने जैसा है.

किसकी अवधारणा पहले आयी, मन या इच्छा. मेरे अनुसार पहले मानव आये फिर उन्होंने घर बनाये.

इच्छाओ को शारीरिक और मानसिक भागो में बाँट सकते है. वैसे इनमे विभेद है भी, नहीं भी | जिस प्रकार मानवों में औरत और आदमी. दोनों समतुल्य भी है, और पूरी तरह अलग भी.
अब इन इच्छाओ का क्या होता है, जिस प्रकार घर में विभिन्न आवरण या अवयव (दीवार, खिड़कियाँ , दरवाजे, रोशनदान, नाली, छत, आदि ) होते है, सर्दी, धूप, बारिश, हवा, पानी, भूकंप आदि से बचने के लिए. उसी तरह मन के अवयव शिक्षा, अनुभव, इतिहास, तथ्य आदि होते है. ये सभी मिलकर मन/विवेक की रचना करते है. जिस तरह घर की परीक्षा होती है, आंधी तूफ़ान में (कठिन समय) उसी तरह मन की परीक्षा होती है, फैसले लेने में.

अब ये मन कैसे काम करता है. इसे कोई देश कैसे चलता है, ठीक उसी तरह समझ सकते है. कही मन तानाशाही होता है, कही लोकतंत्र. सरकार ही मन है, इसके विधेयक, इच्छाए है, और पारित इच्छाओ जो शरीर ..(execute).. करने वाला है, वो विधेयको के सामान मान सकते है.

अब एक इच्छा पारित कैसे होती है. तानाशाही में जो मन में आया, उसी विधेयक को विधान बनाया. और लोकतंत्र में, हर इच्छा पर संवाद होता है, चर्चा होती है, तर्क दिए जाते है, ये सब काम अनुभव, शिखा, जानकारी, तथ्य मिलकर करते है. तब जाकर इच्छा पारित होती है.

एक इच्छा पारित होने पर, जिस तरह काम सरकार कार्यपालिका को देती है, उसी तरह मन, मस्तिष्क को देता है, मस्तिस्क, नोकरशाही और सचिवालय की तरह काम करता है. वो सन्देश जारी करता है ताकि शारीर रुपी कर्मचारी काम कर पाए.

इसे आप किसी को थप्पड़ मरना है या नहीं मरना, पर समझ सकते है, मन का फैसला, दीमाग को सुनाना, दीमाग का हाथ को सन्देश भेजना, और हाथ का हरकत में आना.

अब कोई काम अच्छा हुआ या बेकार, सही हुआ या गलत. यह केवल मन पर निर्भर नहीं है, मस्तिष्क (कार्यपालिका), और शरीर (सभी कर्मचारी) का सही होना भी उतना है महत्वपूर्ण है.
फिर भी यदि मन लोकतान्त्रिक है, हर इच्छा पर तर्क युक्त चर्चा करता है, और तभी इच्छा को पारित करता है तो धीरे-2 मस्तिष्क और शरीर भी बढ़िया बन जाते है.

मन में इच्छाए अपने आप भी आती है, और शिक्षा (तथ्यों की जानकारी), अनुभवों, इतिहास, और जानकारियों (सही और गलत दोनों की) आदि द्वारा भी मन में पैदा की जाती है.

और जब आपका मन, सही फैसले लेगा, तो सब अच्छा होगा.

एक इच्छा वोट देना भी होती है, और जब सही आदमी मंत्री परिषद् बनायेंगे तो, देश का सुधार और कल्याण निश्चित होगा.


सर्वे भवन्तु शुखिं, सर्वे सन्तु निरामया.

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