Wednesday, June 19, 2013

The Day I stood Still.

इस कहानी में यदि आपबीती नज़र आ जाये तो मुझे दोष न देना. हम सभी 30 साल तक एक ऐसे दिमागी बुखार में जीते हैं, और बार-बार खुद से ये सवाल करते है की "हमारे साथ क्या होगा, या हम क्या बन पाएंगे ?'

जब हमारा जन्म होता है तो परिवार को लगता है कि उनकी उम्मीदों और आशाओ का तारणहार आ गया है, जैसे उनको अपने खुद के अधूरे सपनो को पूरा करने वाला शक्तिमान मिल गया हो.

फिर हममे कुछ समझ आने लगती है, इसी समाज की सोच की वजह से अपने ही दोस्तों से प्रतिस्पर्धा करने लगते है ! क्योकि सभी दोस्त या तो पडोसी होते है या स्कूल में एक क्लास से और हमारे माता पिता की चाह उनसे आगे होना रहती है ! वैसे पेरेंट्स अपने गहरे दोस्तों के बारे में बहुत सी कहानिया भी सुनाते है, तब लगता है पता नहीं ये किस दुनिया में रह के आये है, यहाँ तो बस आगे जाने की होड़ है !!

तो ये इस काले बदल की छाया पड़ना होता है | अपने से ही आगे जाने की सोच हमारे दीमाग में काले बदल की तरह छाने लगाती है, कल कैसा होगा, इस बार एग्जाम में कोन टॉप करेगा, और एक ऐसा आशावाद जन्म लेता है कि हम कर्म करने की बजाये हनुमान जी की शरण में चले जाते है |  सरस्वती की वंदना याद करते है और एक्साम्स में गणित के सवालो में उलझ के रह जाते है !

सभी देवताओ से यही आशा होती है की वो हमको टॉप करवा देंगे, और हम अपने कल के सपने बुनना सुरु कर देते है ! ऐसा आशावाद जहा हम सचमुच शक्तिमान बन जाते है | हमें लगता है कि हमारे साथ भगवान सबसे अलग करेगा. और हम सब कुछ करने की ताकत हांसिल कर लेंगे.

वक़्त गुजरता है और हनुमान जी भी काले बदलो को नहीं हटा पाते. 12th के बाद पहला पड़ाव आता है जहा उलझन आती है, भारत के टॉप कॉलेज में हम कैसे पदार्पण करेंगे इन्ही खयालो से हम किसी न किसी कॉलेज में पहुँच जाते है, जहा जो सोचा था वही गायब होता है.

फिर 4th Year तक पहुँचते-२, हम किस जगह काम करेंगे, कैसा ऑफिस होगा | हवाई किले बनाते है, हम कुछ ही दिनों में बॉस बन जायेंगे और जिंदगी फिर केवल ऐश करने के लिए रह जाएगी | वैसे हमारे माता-पिता धरातल पे आ जाते है, उनको अपने सपनो को पूरा होना या न होना पता चल जाता है | वो अब केवल आखिरी जिम्मेदारी 'हमारी शादी' की तैयारी में जुट जाते है |

फिर एक दिन हम ऑफिस में दाखिल होते है, और सबसे ज्यादा उर्जावान कर्मचारी का खिताब भी प्राप्त कर लेते है | कुछ वक़्त बाद सोमवार सबसे बुरा दिन होता है, शनिवर तो जैसे जिंदगी से गायब हो जाता है (सोते रहने के कारण).

अभी तक लगता है की हमारे साथ चलो अब तक कोई स्पेशल नहीं हुआ, अब होगा. एक राजकुमारी/राजकुमार  से शादी होगी.... हम फिर दुआ करते ही की काश एक बार वो सपनों में ही आ जाये, काश उसका चेहरा ही पता चल जाए. शादी जिससे होगी वो कितनी स्पेशल होगी/होगा, और शादी भी स्पेशल होगी, शायद आजतक हुई ही न हो |

फिर वो स्पेशल दिन आता है, और हम ठहर जाते है, (The Day We Stood Still). हमें पता चलता है की हमारी शादी किससे होने वाली है | लेकिन वो दिन भी एक सामान्य दिन होता है |

हमारे समाज में शादी को जिस तरह दर्शाया गया है, उससे आशाये और मुशिबते ही बढ़ी है और कुछ नहीं. एक सीधे साधे इंसान को भी असामान्य होने का एहसास होता है या दिलाया जाता है |

फिर जिंदगी चलती रहती है, वक़्त बहता रहता है, और हम आज तक कैसे यहाँ पहुंचे है सोचने लग जाते है |
कुछ मेरे जैसे लिख देते है, कुछ आप जैसे पढ़ लेते है |

अभी काफिला यही तक पहुंचा है..... :)

इंसान को पहचान जब खुद से मिल जाएगी,
वक़्त की चाल जब हमारे समझ में आएगी,
साथ चलने में जब मज़ा आने लगेगा,
आशाओ की लौ, कर्मो के मोम से जल जाएगी |

Friday, June 14, 2013

The Dream I Aspire.

[This is my dream, while sleeping. Not an open eyed dream.]

It was a nice morning and some of my friends had gathered for a speech at some school in Himalayan Valley (may be). The podium was decorated with flowers & garlands.Students were joining the school function with their parents. There was then a lady who was to share how she had became the IAS officer and all the ways, she tested for fighting with the system. She was a little nervous and wanted to ask me, before she could say anything, about the school and students life.

Next scene that I was seeing was that a few of my friends were sitting under a tree. It was an open ground with trees and grass. The lady was going to deliver her speech as she was the new IAS trainee. (This might be Mussoorie), I felt somehow that I already knew the contents of speech so I started to walk towards an old structure where some children were playing. Moved further and it was a coast there and an old fortress. I enjoyed the sunset there and returned back. It was still morning there. The lady felt bad about her oratory and walked out of the place.

I somehow wanted to say something philosophical about lifetime events and the first time we had faced new situations. I too came out of the place and started singing. Yes ! you read it right, singing. It was in sufiyana style and it was a gazal.

aa........aa......aaaa................ The whole valley stopped and started singing with me. It was the best part, some girls were dancing (in Shimla attire) and whole valley had stood on both sides of the road and all were singing and some were playing instruments. I kept going.

In real life my singing is bad I think and got same feedback too; so I can't just record this gazal in my voice and share here, but I will do asap I found some time and find a good singer. The Tune was fantastic and it was quite new to me too. So in short I composed a Gazal in my dream. It was like this, if you can sing with me too...
aaaaa....aaaaaaaaaa...............
[Gazal is based on the Talk between God and Human Being or its creation.]

हम तो तेरे दर से sssss, aa..ssss..... हम तो तेरे दर से sssss, यूँ ही गुजर जायेंगेs,

हम तो तेरे दर सेss यूँ ही गुजर जायेंगे,

हम तो तेरे दर सेss यूँ ही गुजर जायेंगे,

तेरी मर्ज़ी है की sssss, तेरी मर्ज़ी है की sssss, तेरी रहमत हो या नहींs

हम तो अपने हीsss कर्मो से जाने जायेंगे, नाम तेरा हो हमाराs, हमें परवाह नहीं ||

हम तो तेरे दर सेss यूँ ही गुजर जायेंगेsss

I walked down the road and there was a market at some height, with stairs so climbed up and keep singing.

When I woke up, I felt very happy with tremendous energy in myself. I wrote down those line from Gazals.

This is the power of dream, which can make you happy and all energized in the morning or dull and tired.

With love and hope true wisdom lies with you.

हम तो तेरे दर से यूँ ही गुजर जायेंगे,
तेरी मर्ज़ी है की, तेरी रहमत हो या नहीं |
हम तो अपने ही कर्मो से जाने जायेंगे,
नाम तेरा हो हमारा, हमें परवाह नहीं || (He only to blame not me.)