Thursday, March 21, 2013

A Bottle's Story.

I was resting in a refrigerator,
enjoying company of my sister,

One fellow came, pointed out finger at me
Caretaker sold me for some money,

It was hot and sunny outside,
my cap was opened, which was tight,

When empty, I was thrown carelessly,
Nobody cared or noticed slightly,

I was laying on a rough surface,
Waiting to be crushed over or defaced,

When a car flattened me, I made a noise,
For next action I was  poise,

Sometimes I jumped, sometimes flied,
I don't remember now how I died,

I was disposed and became a garbage,
Waiting to be nabbed and thrown in a bag,

This fellow is wasting time in writing about me,
You too spend some time laughing at me,

Hoping to be recycled ,I will go to a factory,
What will I be, will always be a mystery !! 

Saturday, March 16, 2013

UPSC IFS Exam pattern, A blunder !!

An aspirant after graduation who is preparing for IFS should have done his schooling in English medium ! As an aspirant might have reached an age of 22+ , & convent /english medium schools were accessible to city residents only 15-20 years ago,the time when such aspirants were admitted to these schools. So, majority of IFS aspirants belong to metro cities & not to towns or  villages (near forest area).

So, these aspirants have enjoyed the life of a city where people have money oriented mindset, less green area, surrounded by  industries, lack of open living space, and many other things which are not associated with forests. People of both kinds ,born with silver spoon in their mouth as well as those who can just manage two meals of a day can be easily seen. So, in both the kinds he is not aware of  life of Trees. Even today, if you ask an IFS aspirant if he/she can recognize the tree which they might have seen in books, he/she will definitely be speechless.

Recently, parliament raised a question against UPSC CS Mains English paper, putting forth the pain of Rural Background and other regional language students that they will have less chances to score !! I fail to understand  why they are not opposing the IFS exam pattern, where student from rural background or near forest people are required who really understands trees and ecosystems.

I think as an IFS officer one should love trees and wildlife rather then indulging metrolife. He/she should be more connected to trees and animals rather then people who chase behind money and luxury in their life. This is a fundamental thing that one should possess to increase forest area and preserve wild life.

UPSC should rethink  and allow Hindi and other languages so that forests can be preserved and those who want to earn money can be kept away from wild life.

There may be other aspects but the basic requirement of govt. is to save forest and wild life.

Hope, someday UPSC will understand.

Tuesday, March 12, 2013

समुद्र मंथन - समाजशास्त्र की नज़र मे.

पौराणिक कथाओ मे समुद्र मंथन को देवताओ तथा दानवो का एक सामूहिक प्रयास बताया है, जिसमे नयी वस्तुए प्रकट हुई | मैं  इसे उस समय के समाज मे रहने वाले अच्छे तथा बुरे लोगो के द्वारा नयी वस्तुओ की खोज़ के रूप मे देखता हूँ | इतिहास के हर समय मे समाज़ मे दोनो प्रकार के लोग रहे है और उन्होने अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए हमेशा प्रयास किया है |  इस तरह से आज भी समुद्र मंथन जारी है |

इस तरह के मंथन या अविष्कारों से हर तरह के उत्पाद जन्म लेते है । वैसे हर अविष्कार का उपयोग अच्छे तथा बुरे कार्यो के लिए होता है, लेकिन कुछ अविष्कार केवल बुरा असर छोड़ते है।

इन उत्पादों का वितरण लोगो या लोगो के समूह की योग्यताओ के देखकर किया जाता है  और ऐसा ही इस पौराणिक कथा में किया गया है, देवताओ को अमृत (ताकि अच्छे काम करने वाले हमेशा जीवित रहे), संसार के पालनहार को लक्ष्मी (हमेशा पालन कर पाए ), ऋषियों (ज्ञानी) को कामधेनु आदि ।

वैसे हर अविष्कार का उपयोग सभी ने किया और करते आये है । मैं उन लोगो की बात करना चाहता हूँ जिन्होने (प्रथम) ये फैसला लिया की किसको क्या मिलना चाहिए अर्थात जो असली ताकत के स्वामी थे, जिनके पास नियंत्रण था । तथा उन लोगो की भी जो (द्वितीय) खुद फैसला लेते थे व लेते है, तथा उनके फैसलों को हर वर्ग ने सराहा है ।

जब समाज में एक व्यक्ति का निर्माण होता है तो उसमे अपने जीवन की सार्थकता को समझने का ज्ञान बढ़ने लगता है ।

शुरुआत में उसे ताकतवर, धनवान, शक्तिमान बनने की अभिलाषा होती है तथा उसे ऐसा पद किस तरह मिल सकता है, की खोज शुरू होती है ।  वो पूरे मन, लगन से इसकी तैयारी में लग जाता है, तभी साथ-साथ उसे इस पद की शक्तियों तथा सीमाओ का ज्ञान होता है । यदि  इससे वह संतुष्ट होता है तथा वह पद  प्राप्त कर लेता है तो प्रथम प्रकार का वर्ग बन जाता है । उसे अब केवल अपनी शक्ति तथा सत्ता की सततता को बनाये रखना है,  इसके लिए वो बहुमत की इच्छाओ का सम्मान करने लगता है ।

समाज को निरंतर रखने के लिए सभी वर्गों की आवश्यकता होती है । और ये प्रथम वर्ग अति महत्वपूर्ण है चूकि यह वर्ग निति निर्धारण भी करता है । फिर भी इससे साथ द्वितीय वर्ग (ऊपर ) का निर्माण होता है, इसमें वो लोग होते है जिनको ना बहुमत चाहिए न ही किसी का अनुमोदन । वो अपना फैसला स्वयं लेते है, चूकि  वो फैसला समाज के हित में होता है अतः सभी इनकी प्रशंसा करते है और सबसे ज्यादा सम्मान देते है ।

जैसे शिव जिन्होंने मंथन के बुरे अविष्कार (विष) का निष्पादन किया । ऐसा करने का फैसला केवल उनका था, कोई भी सत्ताधारी उनको आदेश देने की स्तिथि में नहीं था।  लेकिन शिव ऐसे फैसले पर कैसे पहुंचे, यह बात मायने रखती है।

प्रथम वर्ग के कुछ लोग या वे लोग जो समाज में ऊपर (सत्ता, धन, नाम) आने की कोशिश करते है उनको उस पद के बाद की स्थितियों का बोध होता है, उनको मानव जीवन की सार्थकता का वास्तविक द्रष्टिकोण प्राप्त होता है। इसे ही बोद्ध ज्ञान कहते है।  ये लोग सेवा और अहिंसा को परमधर्म मानते है।

आज भी समाज में यही स्तिथि है, आज सबसे ज्यादा इन्ही लोगो की जरुरत है जो अपना 'स्वयं  का' छोड़कर परमार्थ में लग जाते है।

वक़्त के साथ समुंद्र मंथन जारी रहेगा, लोग अपने फैसले लेते रहेंगे। किसी ने भी (भगवन) किसी की किस्मत नहीं लिखी है, आज का विश्व सभी लोगो (कल के) के कर्मो का सम्मिलित उत्पाद है। ये केवल व्यक्ति विशेष पर ही निर्भर करता है वो किस कर्म को चुनता है, बहुतो को ये आजादी नहीं होती (परिस्तिथिया), लेकिन द्रढ़ इच्छाशक्ति आने वाली सभी रूकावटो को हटा देती है।

आशा है विश्व और प्राणीमात्र के उत्थान और कल्याण के लिए आप सभी अपने ज्ञान के समुद्र मंथन को जारी रखेंगे और एक वास्तविक और ठोस द्रष्टिकोण (perspective) को प्राप्त करेंगे। समाज में शिव भी होंगे और भोगी देवता, आम जनता तथा अत्याचारी दानव भी। वो सब आप लोग ही बनेगे कोई अवतार धारण करके नहीं आने वाला।

जय भोले नाथ।