Tuesday, August 31, 2010

8.16.2010 . 8.31.2010

ग़ालिब ने कहा और हमने सुना "जुबान वो इस्तमाल करो, जो तुमको भी समझे और सुनने वालो को भी !!"

इन दो सप्ताओ में, हमने बारिस को बहुत करीब से देखा; मोर को नाचते, कोयल को गाते देखा.
आस पास इतना सारा पानी और हरियाली देखकर ऐसा लगा जैसे राजस्थान फिर से अपनी जवानी के दिनों में आ गया हो !!

इस बार स्वतंत्रता दिवस बिना मिठाईयों के बीत गया, लगता है software engineers  अब  आजादी का स्वाद भूल गए है !! वैसे भी कोल्हू के बैल को कोन बताये की आज काम नहीं करना है !!

इस सप्ताह बारिस की रिमझिम बूंदों ने हमें बहुत भीगोया, कभी-कभी तो जब भी घर से थोडा सा दूर निकलते थे, बारिस शुरू !! पता नही हमसे बारिस को इतना प्यार है या हमें बारिस से, वैसे कुछ भी हो, इस बार सावन पूरे सबाब पे था. करीब १० साल बाद बारिस हुए थी इतनी राजस्थान में, यूँ कहें धरती की प्यास बुझाने खुद इन्द्र देव आये थे !!


घर के पास आने के बाद दिन और रात को जैसे पंख लग गए हो !! हरे-भरे खेतों में घूमना, जो हमें सबसे पसंद है, बारिस के साथ आँख मिचोली, bike का किसी भी खेत में फंस जाना, फिर जोर लगा कर खुद को भी गन्दा कर लेना, पास के गाँव के कुए पे फिर वो कीचड हटाना !  जिनसे मिलने गए थे उनसे दूसरे रस्ते से जाने की सलाह लेना !  कोई तीसरा ही shortkut लेना, और घर आकर बारिस में नहाना !!

कभी सोचा नहीं था, इस तरह जिंदगी एक तरफ से इतना एकांत कर देगी, और दूसरी तरफ से प्रकृति इतना प्यार देगी !!

वैसे चलचित्र सिनेमा देखे हुए हमें २ महीने गुजर गए है, और ऑफिस से 30meter  पे ही multiplex है !! इससे हमें हमारी book से एक quote याद आ गया "

"हम कभी भी अपने आस-पास जो लोग है, उसको महत्व नहीं देते या फिर बहुत कम सायद ये सोच कर की ये तो हमें मिल ही गया है. तभी तो हम भागते है ! और भाग कर जब दूर से मुड़ कर देखते है तो बहुत दुःख होता है  !! वो अधिकार का भ्रम इस कदर चूर-चूर होता है ,  और बस कुछ यादें रह जाती है !! इससे हम जहा पहुंचे है, वह की भी महत्ता को खो देते है !! और ये भागने का क्रम हमेशा जारी रहता है, क्रम को तोड़ना या कही ठहर जाना भी अपने बस में नहीं रहता !! वैसे इसी भागने और रुकने में इंसान का मकसद छिपा हुआ है !!"

एक दिन मंगलवार को मैं भी पहुँच गया अपने junior के साथ सिनेमा हाल, और वो भी लंच टाइम में !! पिपली लाइव :), अच्छी movie है !!

बारिस और हमारा लोगो से मिलना, ये क्रम चलता रहा !! कई relatives से तो पहली बार मिले थे, सभी को अच्छा लगता था जब मैं उनसे मिलने जाता था, पुराने जमाने से नयी पीढ़ी तक, हवेलियों से कोठी तक और पढाई से लेकर job तक बहुत discussion होता था !! मेरे को भी बहुत से आयाम (perspective) जानने को मिले !!

इस बार पता नहीं कैसे हिंदी में लिखने का मन किया, एक तो गूगल crome की मेहरबानी, आप कही भी type कीजिये वो हिंदी में translate कर सकता है :)

सभी को बहुत बहुत शुभकामनाओ के साथ ये 4  लाईने ...

मंजीले और भी मिलेंगी, किनारे और भी मिलेंगे,
उजड़े रास्तों पे कभी महकती बहारे भी मिलेंगी,
इंसान का ये सफ़र है बना, यादों को संजोने के लिए,
ठहर न जाना कही ओ-राही, यहाँ सहारे और भी मिलेंगे !!

6 comments:

bij said...

हिन्दी is good. Dont know its yours or chrome...

Anonymous said...

good to read this ..
nice post :)
vinit

raghu said...

Its all in Hindi. I am out :-)

Amudha said...

Liked the part where you describe about taking people for granted.. Had fun reading.. :)

Anonymous said...

baki sub to thik hai par yeh post mein sub jahan hum ka jikr kiya gaya hai. Woh hum mein kitne log hai woh bhi bata do.

Shiv K. Chaudhary said...

हम में हम अकेले है भाई :), 'मैं' kahana थोडा छोटा/ओछा लगता है !!