Saturday, January 28, 2017

Kitchen waste to healthy food.

Mankind has been producing kitchen organic waste since he started cooking. But the waste was never been a problem to them. The organic waste is decomposed and was consumed by earth. It was very fertile so old establishment started kitchen garden. This is very old concept.

Now-a-days the organic waste is mixed with other plastic and non degradable waste and thrown outside. It create bad odor, give birth to innumerable house flies and heap of non consumable by earth.     

Another thing, we are eating many vegetables today which is harvested using inorganic fertilizers, chemical, and pesticides. This may cause (98% chance) cancer, hearth, mind, liver, lungs, skin related diseases within us and to our children.

Do we want to live healthy, many has stopped worrying about it as hospitals are every where. They believe earning money and spending much on health care.

 So, to provide better world to our next generation we should stop making non degradable waste.
What we can do is two things.
First, we should put organic waste and dry waste in separate dustbins.
Second, we should make manure out of organic waste. This is very simple and it will be ready in 50 days.

1. Separate your edible kitchen waste (vegetable peels, fruit peels, small amounts of wasted cooked food) in a container

2. Collect dry organic matter (dried leaves, sawdust) in a small container

3. Take a large earthen pot or a bucket and drill 4 – 5 holes around the container at different levels to let air inside.

4. Line the bottom with a layer of soil.

5. Now start adding food waste in layers alternating wet waste (food scraps, vegetable and fruit peels) with dry waste (straw, sawdust, dried leaves).

6. Cover this container with a plastic sheet or a plank of wood to help retain moisture and heat.

Every few days, use a rake to give the pile a quick turn to provide aeration. If you think the pile is too dry, sprinkle some water so that it is moist.

Within 2 - 3 months, your pile should start forming compost that is dry, dark brown and crumbly and smelling of earth. There are also ready made composting kits available for those who want to overcome initial resistance to starting composting.

With time and a little patience, composting will become second nature to you.

By segregating, recycling and composting, a family of 4 can reduce their waste from 1000 Kg to less than 100 kg every year.

This manure can be used in growing plants like tomato, chili, coriander, spinach, eggplant, ladyfinger, at home. You can use small pot for each plant.
You will get organic food.Will produce less waste, and your kid will be more active towards nature.

Monday, March 23, 2015

WHY WE CELEBRATE HOLI (हम होली क्यों मनाते है)

जब कभी भी मुझे धार्मिक समारोह, रीती रिवाजो को देखने का समय मिलता है तो मेरे मन में कुछ सहज सरल सवाल आते है (शायद आपके लिए सहज न हो.), इस रिवाज़ की कैसे सुरुआत हुई होगी ? क्यों हुई होगी ? क्या वज़ह है की आज तक ये चल रहे है ? क्या-क्या परिवर्तन इनमे आये है ? इत्यादि.

अभी नव संवत 2072 और हिंदी का पहला महिना चैत्र आधा बीत गया है. ऐसा क्यूँ है की नया साल आधे महिना बाद शुरु हुआ. साफ़ तौर पर देख सकते है, संवत बाद में आया. एक और बात जिस दिन विक्रमी संवत सुरु होता है, उसी समय ईरानियो का नव वर्ष ‘नौरूज़’ सुरु होता है.

तो हिंदी महीने पहले से स्थापित थे, और कोई भी राजा इतने सारे पंडितो, मुनियों और ब्राह्मणों के होते हुए, महीने के आधे में कैसे नया साल सुरु कर सकता है. दूसरी बात ईरानियो का प्रभाव भारत के नाम तक (हिंदुस्तान) पर है, तो इतिहास का कुछ अनुमान तो हम कर ही सकते है. (इरानी सिन्धु नदी को हिन्दू बुलाते थे.)

कोई नहीं, बाल की खाल नहीं निकालते.

बात होली की है. यह हिंदी के आखिरी महिने फाल्गुन का आखिरी दिन अर्थात वर्षांत है. और धुलंडी साल की शुरुआत.

हमारे ब्राह्मणों ने नरसिंह अवतार गढ़ लिया, प्रहलाद गढ लिया, होलिका को माता बना दिया, जो अपने भतीजे को जलना चाहती थी. इस पर मैं टिपण्णी नहीं करना चाहता.

तो फिर होलिका दहन क्यों आया, क्यों अगले दिन रंग लगाते है.

इस पर बहुत कम लोगो ने लिखा है. मैं उस समय की बात सोचता हूँ, जब हिंदी महीनो की पूर्ण रूप से स्थापना हुई होगी.

लोगो ने आपस में सवाल किया होगा, (भारत प्रगति पर था, तो हो सकता हो लोकतंत्र या गणतंत्र रहा हो या कुछ विषयो में जनता या बुद्धिजीवियों की राय ली जाती हो) कि हम साल के आखिरी दिन और साल की शुरुआत को कैसे मनाये.

जैसे दिसम्बर 31, और 1 जनवरी का आजकल चलन है. (पश्चिम की देन)

मेरे अनुसार लोगो ने सोचा होगा, कि हम साल के आखिरी दिन एक साथ खाना बनायेंगे, और मिल-बाँट कर खायेंगे, उस समय कबीलो की बस्ती से गाँव, और गाँव से शहर बने थे. साल के दिनों में क्या-क्या महत्वपूर्ण काम हुए, परिवारों को क्या-क्या उपलब्धियां मिली, कहा-कहा कमज़ोर रहे, इनकी चर्चा के साथ साथ हमारे आपस में एक दूसरे से कितने मनमुटाव हुए, क्यों मनो में दरार आई, इसकी चर्चा को प्रमुख रखा. जैसे आज भी कहते है, बुरा न मानो होली है. (होली, ना की धुलंडी)

एक साथ खाना बनाना, या बड़ी चीज़ को पकाना, फिर अलग-२ पकवान आदि के लये आग की तो जरुरत होती ही है. हो सकता है कि खाना पकाने के बाद रात को आग बड़ी बना कर चर्चाये की जाती हो.

साथ-साथ कुछ खेलो की शुरुआत की होगी. जो फिर एक कबीलाई सोच दर्शाती है. गाँव में वो खेल आज भी खेले जाते है. मैंने भी खेले है, अपने घरो के आस पास, पूर्णिमा की चांदनी रात में, 5-6 घरो को मिला कर रात में लुकम छिपाई (hide and seek) खेलना, बहुत मज़ा आता है. ढोलक बजाना, नृत्य, और खाने के बाद परिवार के साथ बैठ कर चर्चाये सुनना.

तो लोग आपसी तनावों को दूर करते थे, वो भी बातचीत और खेलो के जरिये, ये सुझाव मान कर लागू कर दिया होगा.

फिर सवाल आया नए वर्ष की शुरुआत कैसे हो. इस पर चर्चा में एक तो गले मिलने, सभी को बधाई देने से सुरुआत की होगी. क्योकि पिछली रात को लगभग सभी आपसी मसलों पर नाराजगी दूर हो गयी होगी, अतः गले मिलने, मिठाई बांटने, और नाच-गाना, खाना-पीना आदि की शुरुआत की होगी.

रंग लगाने की शुरुआत बाद में आई होगी, और वो भी शायद नाचगान में शराब में सराबोर होने के बाद. भारतीये कबीले और समाज शराब तो पीते थे. (बुद्ध के समय बहुत व्यापक थी शराब पीना.)

इसमें ना तो प्रहलाद है, ना होलिका है, ना नरसिंह अवतार है. बस एक साल की अंत और शुरुआत है |

आज होली त्यौहार है, विधिवत पूजन से होलिका को प्रज्वलित किया जाता है, चाहे मुहूर्त सुबह 4 बजे का क्यों न हो. ( एक बार मेरे गाँव में सुबह 4 बजे होलिका जली थी.)

ना कोई चर्चा करता, ना सवाल पूछे जाते, नमस्कार या राम-राम जरूर होती है. बस ये त्यौहार किसी तरह शांति से गुजर जाए, बहुतो की यही कोशिश होती है. किसी तरह पोत पूरा हो जाये. अगले दिन लोग गुलाल के बहाने बदला निकलते है, कुछ घरो में छिप जाते है, कुछ खुले आम बदमासिया करते है.

क्यों पोत पूरा करे, क्यों ? क्योकि यह एक त्यौहार है और इसे अगर हम नहीं मनाएंगे तो हम हिन्दू नहीं रह जायेंगे, या हम पर इसे अगली पीढ़ी को देने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी समझ बैठे है !

कोई भी त्यौहार में क्या क्या क्रियाये होंगी, ये कही नहीं लिखा मिलता. बस ये मिलता है की फला-फला लोगो ने इस त्यौहार को इस तरह मनाया था. जैसे कोई यज्ञ हो रहा हो. क्योकि यज्ञो के बारे में साफ़ मिलता है की किस तरह कोनसा यज्ञ किया जाये.

आज हर त्यौहार एक यज्ञ है, आहुति होती है, जजमान आहुति देता है. खुद की बुद्धि की, खुद के समय की, तथ्यों की, इतिहास की. आखिर में बस पोत निभाना बच जाता है, और यही परंपरा वो अगली पीढ़ी को दे जाता है.

एक पढ़े लिखे का काम डिग्री की तस्वीर कमरे में लगाना नहीं है. बल्कि वो कोई भी काम करे, वो उसी तरह क्यों कर रहा है, और वो ये काम कर ही क्यों रहा है, ये जानना बहुत जरुरी है.

और कुछ समझ ना आये तो पहले PK मूवी देख लो.

सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे संतु निरामया |


Sunday, March 22, 2015

Man ki Baat (मन की बात)

मन क्या है, कहाँ रहता है, कैसे सोचता है, कैसे फैसले लेता है, कैसे निर्देश देता है, क्या अनुभव करता है, क्या रिकॉर्ड करता है !! ये थोड़े उलझन भरे सवाल लगभग सभी मनुष्यों में आते है !

मेरे अनुसार, सबसे छोटी इकाई इच्छा है. जो जन्म लेती है, फलती-फूलती है, बलवती होती है, कमजोर होती है और अंत में ख़तम हो जाती है. जैसे की मानव जीवन है. जिस प्रकार सभी मानवों की उम्र अलग अलग होती है, कोई जन्म लेते ही गुजर जाता है, कोई 80-90 साल के बाद. और इन सबकी वजहे होती है कि क्यूँ हर कोई मानव/इच्छा अलग-२ उम्र पाता/पाती है. उसी तरह इच्छाओ की उम्र होती है.

तो मन को हम इन सभी इच्छाओ का घर कह सकते है. जैसे विभिन्न मनुष्य एक घर में रहते है.
ये इच्छाए मष्तिस्क के अलग अलग भाग में जन्म लेती है बढती है, तो पूरा मष्तिस्क मन, और भी सरल रूप में एक देश मान सकते है, जहा एक-जैसे नियम क़ानून हो, क्योकि एक समय मस्तिष्क नियमो की समरूपता की हिसाब से काम करता है. जैसे एक देश के नियम क़ानून समय के साथ बदलते रहते है वही स्थिति मष्तिस्क की होती है. लेकिन एक समय पर एक क़ानून होता है. अतः मन की तुलना एक देश से सही प्रतीत होती है.

इसी क्रम में अलग अलग मनुष्यों के अलग अलग मन का होना, विभिन्न देशो के एक धरती पे होने जैसा है.

किसकी अवधारणा पहले आयी, मन या इच्छा. मेरे अनुसार पहले मानव आये फिर उन्होंने घर बनाये.

इच्छाओ को शारीरिक और मानसिक भागो में बाँट सकते है. वैसे इनमे विभेद है भी, नहीं भी | जिस प्रकार मानवों में औरत और आदमी. दोनों समतुल्य भी है, और पूरी तरह अलग भी.
अब इन इच्छाओ का क्या होता है, जिस प्रकार घर में विभिन्न आवरण या अवयव (दीवार, खिड़कियाँ , दरवाजे, रोशनदान, नाली, छत, आदि ) होते है, सर्दी, धूप, बारिश, हवा, पानी, भूकंप आदि से बचने के लिए. उसी तरह मन के अवयव शिक्षा, अनुभव, इतिहास, तथ्य आदि होते है. ये सभी मिलकर मन/विवेक की रचना करते है. जिस तरह घर की परीक्षा होती है, आंधी तूफ़ान में (कठिन समय) उसी तरह मन की परीक्षा होती है, फैसले लेने में.

अब ये मन कैसे काम करता है. इसे कोई देश कैसे चलता है, ठीक उसी तरह समझ सकते है. कही मन तानाशाही होता है, कही लोकतंत्र. सरकार ही मन है, इसके विधेयक, इच्छाए है, और पारित इच्छाओ जो शरीर ..(execute).. करने वाला है, वो विधेयको के सामान मान सकते है.

अब एक इच्छा पारित कैसे होती है. तानाशाही में जो मन में आया, उसी विधेयक को विधान बनाया. और लोकतंत्र में, हर इच्छा पर संवाद होता है, चर्चा होती है, तर्क दिए जाते है, ये सब काम अनुभव, शिखा, जानकारी, तथ्य मिलकर करते है. तब जाकर इच्छा पारित होती है.

एक इच्छा पारित होने पर, जिस तरह काम सरकार कार्यपालिका को देती है, उसी तरह मन, मस्तिष्क को देता है, मस्तिस्क, नोकरशाही और सचिवालय की तरह काम करता है. वो सन्देश जारी करता है ताकि शारीर रुपी कर्मचारी काम कर पाए.

इसे आप किसी को थप्पड़ मरना है या नहीं मरना, पर समझ सकते है, मन का फैसला, दीमाग को सुनाना, दीमाग का हाथ को सन्देश भेजना, और हाथ का हरकत में आना.

अब कोई काम अच्छा हुआ या बेकार, सही हुआ या गलत. यह केवल मन पर निर्भर नहीं है, मस्तिष्क (कार्यपालिका), और शरीर (सभी कर्मचारी) का सही होना भी उतना है महत्वपूर्ण है.
फिर भी यदि मन लोकतान्त्रिक है, हर इच्छा पर तर्क युक्त चर्चा करता है, और तभी इच्छा को पारित करता है तो धीरे-2 मस्तिष्क और शरीर भी बढ़िया बन जाते है.

मन में इच्छाए अपने आप भी आती है, और शिक्षा (तथ्यों की जानकारी), अनुभवों, इतिहास, और जानकारियों (सही और गलत दोनों की) आदि द्वारा भी मन में पैदा की जाती है.

और जब आपका मन, सही फैसले लेगा, तो सब अच्छा होगा.

एक इच्छा वोट देना भी होती है, और जब सही आदमी मंत्री परिषद् बनायेंगे तो, देश का सुधार और कल्याण निश्चित होगा.


सर्वे भवन्तु शुखिं, सर्वे सन्तु निरामया.

Tuesday, November 18, 2014

हम किस रस्ते जा रहे है, उन्नति या पतन (आध्यात्मिक लेख)

हम सभी को आत्म मन्थन करते रहना चाहए.

क्या हमारा मन उन्नति के राते पर है (पवित्र विचारो का स्थान है) या पतन के रास्ते पर है (विकारों से ग्रस्त है) !!

प्रेम, विनम्रता, निर्लोभ, ममता और स्वाभिमान को पवित्र विचार, और काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद (घमंड) को विकार माना गया है !

इन सभी में बहुत कम फासला होता है. तो हम ये कैसे जान पाए की हम कोंनसे विचार रखते है ?

एक सरल तरीका है. हम इन विचारो के अध्ययन की बजाय इनके पूरे होने तथा टूटने की स्थति में हमारा मन का क्या होता है यह जानकार भी पता लगा सकते है.

जैसे कुछ सवाल अपने आप से करे ...

क्या हमें इन भावनाओ की पूर्ती होने पर आनंद, शांति, और संतुष्टि का अनुभव होता है; या भावना अतृप्त रहती है और हमें ज्यादा प्राप्त करने की लालसा बढती जाती है !!

क्या इन भावनाओ के आहात होने, अपूर्त रहने पर हमें क्रोध आता है, हम अधीर हो उठते है, क्या हम कोई फैसला नहीं ले पाते (विवेक साथ नहीं देता). या क्या हम थोडा बैठ कर सोचते है की ऐसा कैसे हुआ, क्यों हुआ, और अगर हम किसी दूसरे तरीके से करते तो क्या अलग हो सकता था. क्या हम धीरज रख कर आत्म चिंतन करते है !!

और सरल करने के लिए प्रेम और मोह को लेते है ....

प्रेम की स्थिति में आप मिलन की स्थिटती में शांति, सुख का अनुभव करेंगे. आपका मन चिंता मुक्त होगा, मन में उल्लास होगा. मिलन नहीं होने के स्थिति में आप दुआ करेंगे, कुछ यादें ताज़ा करेंगे.

इसके उलट काम की भावना कभी तृप्त नहीं होगी, और अपूर्ति क्रोध व आवेश को जन्म देगी. आप अपने आप को और सामने वाले को कोसेंगे.

अब मोह की स्थिति में आप अपने (जिनसे मोह है) को, चाहे वो लायक हो या नहीं, सब कुछ देने का प्रयत्न करेंगे, और ये यत्न भी अतार्किक, तथा असंवधानिक, गैर-न्यायिक होगा. (वंशवाद) चाहे वो आपका ही अनादर क्यों न करे, सेवा न करे, सही बात ना माने, फिर भी आप बस बलिदान देने को उतारु हो.

और ममता की स्थिति में आप प्यार के साथ-साथ अपने(जिनसे ममता, प्यार है) को ऐसा बनाने की कोशिस करेंगे की वो खुद सामर्थवान हो सके. बलिदान उस स्थिति में करेंगे जब समाज, देश को फायदा होता हो.

Thursday, May 29, 2014

Speed Limit for Car Manufacturer's.

When a young blood sits in driver's seat, he pushes the accelerator to the extent of touching the car's floor. This is world wide phenomenon and will never die. But these thrill creating events cause a great loss when this young blood spills over highways, or makes others blood to spread over. The fuel wastage is high and environmental pollution increases.

Every government, environmentalist and parent's has concerns in this. And the problem is becoming serious nowadays. Govts are making laws & policies, opening hospitals, widening roads etc. Environmentalists are growing trees. And parents are praying to God for their children's safety after allowing them to drive (no other choice left).

But what is the outcome; pollution, accidents and death-tolls are increasing. I feel something wrong about it and what is it ? We apply aftermath solutions. Can we be proactive and prevent this beforehand. We know that Govts. can't punish before crime but can prevent it by increasing surveillance. 

So, in this case, if the car's and other vehicle's manufacturers are guided to make vehicle which speed can't exceeds the speed limits of a particular country's. Can this be a solution ?

In India, the maximum speed on any road is 90 km/hr. In USA 130 km/hr. and so on. But when we drive a car it can be accelerated  to 80km/hr (Nano) or 230 km/hr (Bugatti/Ferrari). 

Why these cars run so fast even no government wants to run them at this speed. May be because govt is made of people and they too want to break the rules or they don't have visions. 

Lets say what if all car manufacturers make cars which can run only within limits for a particular country, can there be less pollution, less accidents ? And for vehicle owners less maintenance, less expenditure on fuel, less prays to God for loved one's safety ?

There are many other benefits of speed limit. Police can track down the running vehicle with minimum hurdles. Drug mafias and other criminals can't run away in vehicles.  Running vehicle can be halted within safe distance. Inflation will come down as less fuel will be burnt. And so on.

Its just a proactive idea, and to get its result at least somewhere, should be tested. There are many examples where speeding causes extreme troubles, like everybody fears from Haryana roadways. Chain car accidents on highways. Even if you have stopped your vehicle in safe distance, you still fear that following vehicle can stuck your vehicle. 

Friday, December 20, 2013

क्या मैं नास्तिक हूं?

पिछले कुछ समय से जब भी किसी तीर्थ स्थान या पर्यटकों की ज्यादा भीड़भाड़ वाली जगहों पर स्थित मंदिरों में गया तो वहां से लौटने के बाद मन में विचार आया कि अगली बार ऐसी किसी जगह नहीं जाना है। लेकिन आदतें इतनी जल्दी नहीं छूटतीं। फर्क यह आया है कि अब इन अंधविश्वासों और आडंबरों को तर्क की दृष्टि से देखने की नई आदत लगी है। हालांकि ईश्वर में आस्था अब भी बरकरार है, लेकिन धर्म-स्थलों पर व्याप्त बुराइयों से मन दुखी हो जाता है। अपने घर में बने छोटे मंदिर या मुहल्ले के मंदिरों में सिर झुकाते हुए मन में जितनी श्रद्धा उमड़ती है, तीर्थ-स्थान या सुप्रसिद्ध मंदिरों में इसका आधा भी महसूस नहीं होता। इन जगहों पर जो बातें दिमाग में चलती रहती हैं, वे कुछ इस प्रकार हैं- जूते-चप्पल ठीक से रखो; कहीं यह आदमी हमें ठग तो नहीं रहा; पंडितों के चक्कर में मत पड़ो, वरना जेब खाली हो जाएगी; आमतौर पर इतनी गंदगी, मानो कोई कचरा घर हो; दर्शन के लिए लाइन में खड़े-खड़े हालत खराब आदि।

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ऐसा सोचने वाला मैं अकेला नहीं, ज्यादातर लोगों के दिमाग में यही बातें चल रही होती हैं। अब ऐसे में पूजा-पाठ में कैसे मन लग सकता है। बचपन से लेकर आज तक जब भी कहीं घूमने की योजना बनी तो किसी न किसी प्रसिद्ध मंदिर या तीर्थ-स्थान का चुनाव किया गया। ऐसा होना लाजिमी भी है। मंदिरों के इस देश में यह मध्यवर्ग की मानसिकता के भी अनुकूल है। झारखंड का देवघर स्थित मंदिर शिवभक्तों के लिए बहुत ही पावन माना जाता है। लेकिन यहां के पंडितों के जाल से बचना लगभग नामुमकिन है। खासकर तब, जब आपको कोई कर्मकांड भी कराना हो। काशी में भी तकरीबन यही स्थिति है। ज्यादातर जगहों के मशहूर और ज्यादा भीड़ जुटने वाले धार्मिक स्थानों पर मंदिर में प्रवेश करते ही दुकानदार इस तरह अपनी दुकानों में जूते-चप्पल रखने की विनती करते हैं, जैसे किसी व्यक्ति के जूते रखते ही उनकी दुकान पवित्र हो जाएगी। इसके बाद पूजा की सामग्री देकर (उनके हिसाब से) भेज दिया जाएगा। वापस आने पर पता चलता है कि उस सामान का तिगुना दाम वसूला जा रहा है। लोग चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते हैं, क्योंकि उन्हें पापी और नास्तिक साबित करने में एक मिनट की भी देरी नहीं की जाएगी। ऐसा बर्ताव भी किया जा सकता है, जैसे कोई उस दुकान में जबरन घुस आया था।

इन मंदिरों में भगवान की मुख्य मूर्तियों के अलावा छोटी-बड़ी सैकड़ों मूर्तियां नजर आती हैं और उसके बगल में एक पंडित भी लोगों को वहां पैसे चढ़ाने की नसीहत देता है। अगर किसी ने उसकी बात अनसुनी की तो उसे भला-बुरा सुनाया जाएगा और ईश्वर के कहर का भी खौफ पैदा किया जाएगा। महाराष्ट्र का त्रयंबकेश्वर हो या अन्य कोई ज्योतिर्लिंग, सबकी तकरीबन यही स्थिति है। कोलकाता के प्रसिद्ध कालीबाड़ी में तो पंडित लाइन लगा कर भक्तों का इंतजार करते हैं। उन्हें ‘वीआइपी’ यानी मंदिर में स्थित भगवान का दर्शन अलग से कराने का लालच दिया जाता है। मंदिर परिसर के पास ही पुलिस थाना है और सिपाही मंदिर में चौकसी करते नजर आते हैं। इसके बावजूद यह सब खुलेआम होता है।

मैंने जब थाना प्रभारी से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि वे इससे निबटने में सक्षम हैं, लेकिन उनके हाथ बंधे हुए हैं। कोई भी सरकार धार्मिक विवाद में पड़ने से परहेज ही करती है। दूसरी ओर, जागरूकता के अभाव और अंधविश्वास के चलते यह कारोबार फलता-फूलता रहता है। इसी तरह, शिर्डी में पंडितों का खतरा तो नहीं है, लेकिन वहां जाना बहुत महंगा पड़ सकता है। होटल में रुकने का किराया दिन और भीड़ के हिसाब से तय किया जाता है। शनिवार और रविवार को छुट्टी का दिन होने की वजह से ज्यादा दर्शनार्थी जुटते हैं, सो उस दिन कमरे के लिए मोटी रकम चुकानी पड़ती है। गया का विश्व प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर हो या बौद्धों की सबसे पावन-भूमि बोध गया, कमाई के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। खासकर विदेशी पर्यटकों से छोटी-छोटी चीजों के लिए मनमानी रकम वसूली जाती है।

भारत को मंदिरों का देश कहा जाता है। लेकिन सच यही है कि यहां के मंदिरों की दशा काफी खराब है। एक तो ठग हर मोड़ पर भोले-भाले लोगों को ठगने का इंतजार करते रहते हैं, वहीं चारों तरफ पसरी गंदगी किसी को भी नाक-भौं सिकोड़ने पर मजबूर कर देती है। ऐसा लगता है कि अंधश्रद्धा के आगे सरकार ने भी घुटने टेक दिए हैं। ऐसी हालत में अगर मेरा मन इन तथाकथित पवित्र जगहों पर जाने का नहीं करता तो क्या मैं नास्तिक हूं?

Monday, November 18, 2013

Chingu Blanket - Himachal and J&K tourism

Manali, is the place which gives a feeling of satisfaction & contention among its residents .Its clearly visible that the local residents are highly contended with their earnings & lifestyle, irrespective of the acute weather conditions. They are dependent on agriculture but nobody knows when nature will spoil the vegetatation :(

Our Taxi driver was a very gentle man. Travelling with him was giving us much comfort to feel that we are with our local guardian. He had introduced us with the culture, living style etc. of Manali. To our surprise, he alerted us to be cautious of the clever & decisive shopkeepers.

We visited the local market on the first day, we almost didn't find any garment shop which was not selling the so -called  blanket -"CHINGU". We felt like buying it. Every shopkeeper was offering similar package - 1 chingu double bed - 1 double bed sheet - 1 single bed sheet & 2 more items (don't remember now ), in total five products. But we were not interested in any product other than chingu. We found it costly there & felt that the shopkeeper was deceiving us with the package he was offering. So decided not to buy it from that market & check the authenticity first.

We went back to our hotel & searched  a few websites & became more through with the product now. So we decided to buy it from Kullu .Our driver also suggested the same. He introduced us to a shop (Sood Shawls, Kullu) in Kullu. We could now get the Chingu separately (without any other product with it ). We found the price very genuine - Rs. 2000/- with the same terms & conditions as in Manali viz . it can be replaced after 5 years etc.

Now we are using it for the second season . It is giving perfectly good service, very cozy & smooth to touch.
We are now planning to get a second chingu delivered from the same shop !!

Thanks to our driver and pure spirit of Manali.